मुक्तक।

मुक्तक-

अंजन-

लगाकर आँख में अंजन इशारों से बुलाती हो
लरजते होठों की थिरकन से दिल को लुभाती हो
तुम्हारे रूप के सौंदर्य में यूँ डूब जाता हूँ
उतर कर आँख से मेरे हृदय को बींध जाती हो।।

अनुबंध-

प्रीत के एहसास पर संबंधों के हैं नींव सारे
और करते हैं हृदय में मृदुल भाव के प्रबंध सारे
हों नयन में स्वप्न या के साँसों में सरगम कोई
नेहों की निधियों में संचित प्रेम के अनुबंध सारे।।

अंकित-

मेरे गीतों में अंकित हर शब्दों का विस्तार तुम्हीं हो
मेरी साँसों में सुरभित नव यौवन का संचार तुम्हीं हो
तुमसे जीवन की आशा और तुमसे ही अभिलाषा सारी
मेरी पलकों में संचित नव सपनों का संसार तुम्हीं हो।।


©️✍️अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद
24सितंबर, 2021


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