अंक में तनहाइयाँ।

अंक में तनहाइयाँ।  

साँझ का धुँधला अँधेरा
याद की परछाइयाँ थी
था गगन में शोर अतिशय
अंक में तनहाइयाँ थीं।।

था दिवस का अंत लेकिन
रात की शुरुआत थी वो
शून्य में अंकित वो क्षण
अरु मौन कितनी बात थी।
मौन के प्रहर में कितनी
व्यग्र वो अँगड़ाइयाँ थीं
था गगन में शोर अतिशय
अंक में तनहाइयाँ थीं।।

वेदना का तीक्ष्ण कण जब
बींधता हृद में चुभा था
मौन पीड़ा के स्वरों से
हाय मन गुंजित हुआ था।
मौन के उस वेदना में
कितनी रुसवाईयाँ थीं
था गगन में शोर अतिशय
अंक में तनहाइयाँ थीं।।

रात्रि के अंतिम प्रहर में
मोक्ष का अहसास देकर
मुक्त बंधन से हुए थे
प्रीत को विस्तार देकर।
विस्तार के उस पार भी
पीर की परछाइयाँ थीं
था गगन में शोर अतिशय
अंक में तनहाइयाँ थीं।।

©️✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        15जुलाई, 2021




कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

ग़ज़ल - आँखें भींग जाती हैं

ग़ज़ल - आँखें भींग जाती हैं  तुझे यादों में मिलता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं तुझे मैं ख़त में लिखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं ​ तेरा चेहरा ही ब...