फर्ज की राहें।

फर्ज की राहें। 

गा रहे तुम गीत जिसके
क्या दर्द उसका देखा है।।

खेतों में खलिहानों में
बागों में चौबारों में
रात के अंधकारों में
या सूर्य के अंगारों में
तप गए हैं जिसके चरण
तुमने उसको देखा है
गा रहे हो गीत जिसके
क्या दर्द उसका देखा है।।

गाँव के पगडंडियों से
शहर की राहें खुली हैं
स्वप्न देखा एक ने जब
साँस दूजे को मिली है
एक की गुमनामियों में
दूजा पलते देखा है
गा रहे हो गीत जिसके
क्या दर्द उसका देखा है।।

दूर सीमा पर खड़े हो
मधुरस गीत गा रहे जो
स्वयं को आहूत कर के
देश भाव जगा रहे जो
छुपी उस भावनाओं का
क्या मर्म तुमने देखा है
गा रहे हो गीत जिसके
क्या दर्द उसका देखा है।।

मिलेंगी राहें यहाँ जब
नव पथ का निर्माण होगा
जब चलेंगे साथ में जब
स्वप्न सब साकार होगा
उस स्वप्न के साकार का
क्या फर्ज तुमने देखा है
गा रहे हो गीत जिसके
क्या दर्द उसका देखा है।।

©️✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        06जून, 2021



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