क्या नहीं अपराध है।

क्या नहीं अपराध है।  

झूठ है अब क्यूँ मुखर 
सत्य है बोलो किधर
अंक में अवसाद के
ढूँढ़ती है इक नजर
अब दर्द ये अगाध है
क्या नहीं अपराध है।।

रात काली हो रही 
बात काली हो रही
चाँदनी भी गुम यहाँ
भोर जैसे खो रही
क्यूँ दर्द ये असाध है
क्या नहीं अपराध है।।

युगों के बीच फँसकर
उमर जाने पिस रही
कर रही मधुपान या
फिर एड़ियाँ घिस रही
मोक्ष क्यूँ आगाध है
क्या नहीं अपराध है।।

कौन पूछे वक्त से
घाव जो गहरे लगे
मौन उसके पंथ में
आज क्यूँ पहरे लगे
क्यूँ दर्द ये दुसाध है
क्या नहीं अपराध है।।

©️✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        16जून, 2021

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