मन का दर्पण।

मन का दर्पण।  

रोज जो देखोगे दर्पण तब, जाकर खुद से मिल पाओगे
रहे दूर जो अपनेपन से, मुश्किल है के खिल पाओगे।।

जीवन है इक सफर सुहाना
आज इधर कल उधर ठिकाना
पहचान गए जो तुम खुद को
नहीं जरूरी कोई बहाना
अपने अंतस में झांकोगे, भीतर कितना कुछ पाओगे
रोज जो देखोगे दर्पण तब, जाकर खुद से मिल पाओगे।।

दूजे के शब्दों में पड़कर
वक्त अपना बर्बाद करो ना
जग के तानों को सह लेना
चुप रहना आवाज करो ना
रुके रहे यदि लम्हों में तो, सदियों में फिर क्या पाओगे
रोज जो देखोगे दर्पण तब, जाकर खुद से मिल पाओगे।।

एक दौर था देखा तुमने
जब तुमसे गुलशन उजियारा
एक दौर अब आया है ये
जब तेरा न कोई सहारा
उसी दौर में पड़े रहे तो, नव जीवन कैसे पाओगे
रोज जो देखोगे दर्पण तब, जाकर खुद से मिल पाओगे।।

कभी सुनहरे गीतों से ही
तुमने दिल बहलाया था
शब्दों को बारीक पिरोया
तब जाकर गीत बनाया था
भाव हीन जो हुए शब्द तो, फिर से कैसे रच पाओगे
रोज जो देखोगे दर्पण तब, जाकर खुद से मिल पाओगे।।

©️✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
       14जून, 2021



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