नूतन जीवन।

नूतन जीवन।  

साँसों पर कैसा पहरा है
संताप यहाँ क्यूँ गहरा है
क्यूँ जंजीरें है पैरों में
ये सन्नाटा क्यूँ पसरा है।

उम्मीदों के आकाशों पर
ये आशंका क्यूँ भारी है
क्यूँ सहमे सहमे लोग पड़े
है कैसी ये लाचारी है।

सन्नाटे अब चीख रहे हैं
आवाजें अब मौन पड़ी हैं
मंजिल मंजिल राह चली जो
अवरोधों में रुकी पड़ी है।

रुकी कहानी मध्यांतर में
उसको फिर से कहना होगा
अवसादों से बाहर आकर
नूतन जीवन रचना होगा।।

©️✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        15 मई, 2021


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