पहचान।

पहचान।  

किसने कब चाहा है जग में
के पहचान पुरानी हो
सबकी अपनी बातें हों औ
सबकी एक कहानी हो।।

जीवन का पथ चाहे मुश्किल
या कितनी ही बाधा हो
चलें निरंतर विश्वासों से
पूर्ण सभी अभिलाषा हो
जिस जिस पथ पर कदम पड़े हों
सब पर अमिट निशानी हो
किसने कब चाहा है जग में
के पहचान पुरानी हो।।

बीते पल की सारी बातें
छोड़ पुरानी आघातें
बनकर दीप जले राहों में
रोशन हों अँधियारी रातें
छँटे अँधेरा उम्मीदों से
सस्मित सभी कहानी हो
किसने कब चाहा है जग में
के पहचान पुरानी हो।।

यहाँ समर में सभी डटे हैं
जीवन का अहसास लिए
सभी अड़े हैं तूफानों में
मुट्ठी में आकाश लिए
सबकी अपने कर्तव्यों की
गुंजित सदा कहानी हो
किसने कब चाहा है जग में
के पहचान पुरानी हो।।

©️✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        25मई, 2021


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