जब देखा मैंने बचपन को।

जब देखा मैंने बचपन को।   

मोड़ कदम पीछे जब देखा
मैंने अपने बचपन को
भूल गया इस जीवन के
ना जाने कितनी अनबन को।।

वो माँ की गोदी उसका आँचल
श्वेत फेनिल रुई सा बादल
वो उसकी हल्की प्यारी थपकी
मुझे आज भी करती पागल।

अहसासों के आँगन में जब
देखा आज लड़कपन को
भूल गया इस जीवन के
ना जाने कितनी अनबन को।।

उँगली थामे चला पिता की
मन में ढेरों आस लिए
छोटी सी अपनी मुट्ठी में
सपनों का आकाश लिए।

रहा पिता के साये में जब
कोइ तोड़ सका ना बंधन को।
भूल गया इस जीवन के
ना जाने कितनी अनबन को।।

देखा जब स्कूल पुराना
याद आ गया वही जमाना
कंधों पर बस्तों को टाँगें
कुछ अनजाना कुछ पहचाना।

श्याम पट के धुँधले अक्षर
याद दिलाते बचपन को।
भूल गया इस जीवन के
ना जाने कितनी अनबन को।।

वो मित्रों के साथ घूमना
खुली राह में साथ झूमना
कभी मचलना, कभी झगड़ना
अगले ही पल साथ ढूंढना।

कितने भाव छुपे होते थे
उस झुठलाते अक्खड़पन को।
भूल गया इस जीवन के 
ना जाने कितनी अनबन को।।

जैसे जैसे उमर बढ़ रही
हम उलझ गए इस जीवन में
हमको ये मालूम ना हुआ
हम छोड़ चले क्या उपवन में।

आज स्वार्थ में उलझा जीवन
तोड़ रहा इस मधुवन को।
भूल गया इस जीवन के
ना जाने कितनी अनबन को।।

कहीं पुराने दिन मिल जाते
उन्हें समेटता दामन में
औ मीठी मीठी यादों को
पुनः सहेजता आँगन में।

काश वही बचपन मिल जाता
फिर से जीता अल्हड़पन को।
भूल गया इस जीवन के
ना जाने कितनी अनबन को।।

✍️©️अजय कुमार पाण्डेय
       हैदराबाद
       13दिसंबर, 2020



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