कबीर फिर से आ जाओ।
घिरी हुई है जंजालों में
बिखर रही है आज चेतना
लोभ मोह और सवालों में।।
ढाई आखर प्रेम यहाँ पर
भारी भरकम लगता है
घिसी पिटी पोथी में देखो
कैसा जीवन दिखता है।
आज भावना भटक रही है
वादों और खयालों में
लगता जीवन घिरा हुआ है
अवसादों के ज्वालों में।
बीनी कभी जो तुमने चदरिया
पैबंदों में लिपट रही है
ओढ़ के मैली वही चदरिया
कितनी साँसें सिमट रही है।
जाने ऐसा क्यूँ लगता है
भूख यहाँ पर सस्ती है
पत्थर वाली चकरी भी
उसे देख कर हँसती है।
रोज जगाने की खातिर
शोर यहाँ सब करते हैं
इक इक पल जीने की खातिर
रोज यहाँ सब मरते हैं।।
आज वक्त भी बाट जोहता
प्रश्नों का अंबार लिए
अब है कहाँ खड़ा कबीरा
मन में यही गुहार लिए।
भटक रहे इस जीवन को
राह दिखाने आ जाओ
जीवन का वो गुढ़ ज्ञान
फिर से समझाने आ जाओ।।
✍️©️अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद
12दिसंबर, 2020
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