जीवन गीत सुनाऊँ।

      जीवन गीत सुनाऊँ।   

बिखरे बिखरे तुम रहते हो
किस विधि बोलो आज मनाऊँ
कितना कुछ कहना है तुमसे
किस विधि बोलो आज सुनाऊँ।

आखिर ऐसी कौन व्यथा है
जिसने तुमको घेरा है
बोलो कौन बचा है जग में
जिसको दुःख ने छोड़ा है।

सुख-दुःख साथ चले हैं अपने
कैसे अब तुमको समझाऊं।
कितना कुछ कहना है तुमसे
किस विधि बोलो आज सुनाऊँ।।

जीवन अपना एक सफर है
कभी इधर तो कभी उधर है
थककर बैठ गया जो इसमें
मिली उसे न पुनः डगर है।

कभी डगर में धूप मिले तो
आशाओं के फूल बिछाऊँ।
कितना कुछ कहना है तुमसे
किस विधि बोलो आज सुनाऊँ।।

तुमने कितना कुछ झेला था
पर जीवन से हार न मानी
कितने शूल चुभे थे पग में
पर कांटों से हार न मानी।

भूल गए क्या सारी बातें
बोलो कैसे याद दिलाऊँ।
कितना कुछ कहना है तुमसे
किस विधि बोलो आज सुनाऊँ।।

चलो आज फिर दोनों मिलकर
उम्मीदों के दीप जलाएँ
अपने सपनों को फिर खोजें
आशाओं के फूल खिलायें।

आशाओं की वीणा पर फिर
सपनों वाले राग सजाऊँ
तुम फिर गीत लिखो जीवन के
मैं फिर तुमको गीत सुनाऊँ।।

✍️©️अजय कुमार पाण्डेय
      हैदराबाद
     15नवंबर,2020





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