कर्मयोग।

     कर्मयोग।   

ना जीत के उन्माद में
ना हार के अवसाद में
जो मिले स्वीकार मुझको
शिकवा नहीं संसार में।

आज जो अपना यहाँ है
था कल वो किसी और का
मोह कैसा आज है फिर
निश्चित नहीं जब ठौर का।

हैं मुसाफिर सब यहाँ पर
चल रहे अपने सफर में
सबका अपना आसमां है
रुकना फिर क्या डगर में।

जो मिला तुझको सफर में
उसका न तू अभिमान कर
साथ तेरे चल रहे जो
सभी का तू सम्मान कर।

पल भर की है ये जिंदगी
हाथ नहीं कुछ आएगा
बस तेरा सत कर्म ही
बाद यहाँ रह जायेगा।।

✍️©️अजय कुमार पाण्डेय
      हैदराबाद
     13नवंबर, 2020

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