मुखर सत्य।

        मुखर सत्य।

तुम ही थे क्या कुछ कहे थे
शब्द सुविधा के गुहे थे
खुद तुम्हें नहीं याद शायद
घाव कितने हम सहे थे।।

मात्र सुविधा के लिए यहां
आरोप था तुमने मढ़ा
झूठ का घेरा बनाकर
फिर भाव था उसमें गढ़ा।

झूठ तुम्हारी हर बात में
झूठ था हर व्यवहार में
झूठ की थी चादर बुनी
झूठ था हर जज्बात में।

पर सत्य के होते मुखर
आरोप गए सारे बिखर
दृष्टांत एकदम साफ था
दृश्य गए तब सारे निखर।

जो सत हो तो अटल रहो
मार्ग पर तुम अविचल रहो
अवरोध अगणित और हैं
निर्बाध तुम चलते रहो।।

✍️©️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        09जून, 2020



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