इक नया आगाज़ लिखते हैं।

इक नया आगाज़ लिखते हैं।    

लम्हा-लम्हा हिसाब रखते हैं
तेरी हर बात का जवाब रखते हैं।।

दर्द आंखों से छलक न जाये
इसलिए चेहरे पे हिजाब रखते हैं।।

यूँ न समझो के कुछ नहीं समझता
तेरे हर सितम का जवाब रखते हैं।।

तेरी चाहत ने सहारा दिया था कभी
हम आज भी उसकी याद रखते हैं।।

माना कि मुझे भूल गए हो तुम
पर हम यादों की सौगात रखते हैं।।

डूबे होंगे लाखों साहिल पे मगर
हम तो हौसलों की पतवार रखते हैं।।

राह में हो कितना ही घना अंधेरा
संग में अपने चिराग रखते हैं।।

ये न समझो कि चुक गया हूँ मैं
हर लम्हा नया आगाज़ लिखते हैं।।

✍️©️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        29जून,2020


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