पदचिन्ह


पदचिन्ह।                                                        
कर्तव्यमार्ग पर चलते चलते
पदचिन्हों के छाप हैं छपते
गीली मिट्टी पर हस्ताक्षरित
उपस्थिति के निशान हैं बनते।

कोटि चरण है, कोटि बाहु है
कोटि भाव है, कोटि मार्ग है
पर मानवता के इस पथ में
लक्ष्य सुनिश्चित, प्राप्य एक है।

गढ़ते जाना है नवजीवन
भरते जाना है सूनापन
भाव जो पुण्य श्लोक लिखेंगे
जीवन तब होगा मनभावन।

दूर क्षितिज तक है जाना 
ले उम्मीदों का ताना बाना
सुगठित, मधुरिम भाव लिए
उम्मीदों के नवपुष्प खिलाना।

कर सुनिश्चित ध्येय चलेंगे
अनवरत, अविराम चलेंगे
कर्तव्यपथ पर चलते चलते
पदचिन्हों के छाप बनेंगे।।

✍️©️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        03मार्च, 2020

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