कुछ तुम चलो, कुछ हम चलें

कुछ तुम चलो, कुछ हम चलें                                     

राह कब मुश्किल यहां
फासले न थम सकें
मिट जाएंगी दूरियां
कुछ तुम चलो, कुछ हम चलें।।

व्यर्थ है सब जिद्द यहां
व्यर्थ आडंबर सभी
खोल कर दिल की जिरह
कुछ तुम कहो, कुछ हम कहें।।

नफरतों का दौर हो जब
प्रीत का गागर लिए
आओ किसी पनघट पर
कुछ तुम भरो, कुछ हम भरें।।

स्वार्थ सिद्धि के लिए
मुंह मोड़ करके न चलो
कर्तव्यनिष्ठ मार्ग है ये
कुछ तुम डटो, कुछ हम डटें।।

हताश न होना कभी
विश्वास न खोना कभी
रिश्ते ये अनमोल हैं
रिश्तों के खातिर यहां
कुछ तुम चलो, कुछ हम चलें।।

अजय कुमार पाण्डेय

हैदराबाद

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