रखता हूँ

         रखता हूँ         

ऐ ज़िंदगी तेरे हर प्रश्नों का जवाब रखता हूँ
तेरे हर गुज़रे पन्नों का किताब रखता हूँ।
तुझे संवारने में गुज़र गए जो हसीन पल
उन सभी पलों के हिसाब रखता हूँ।।

हर रिश्ते में मैंने खुद को ही ढूंढा है
तस्वीर किसी की भी रही हो
उसका अक्स खुद में ही ढूंढा है
खुद को भूल न जाऊं कभी
इक आईना हमेशा पास रखता हूँ।।

ऐ ज़िंदगी तेरे बीते हर पल का हिसाब रखता हूँ।।

चंद लम्हे पहले साथ चल रहे थे
चंद लम्हों में ही बेज़ार हो गए
सुनकर भी उनके सारे गिले शिकवे
मैं होठों पर हर पल मुस्कान रखता हूँ।।

ये सोचकर के बड़े अनमोल रिश्ते हैं ये दुनिया के
मैं इन सभी रिश्तों का मान रखता हूँ
डरता हूँ कि कहीं रूठ न जाएं ये रिश्ते
इसलिए अकसर चुपचाप रहता हूँ।।

ये न समझ ऐ ज़िंदगी
के तुझसे मैं डर गया हूँ
सच तो ये है कि
मैं तेरे दिए हर ज़ख्मों का हिसाब रखता हूँ।।

अजय कुमार पाण्डेय





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