ज़िंदगी का खेल

       ज़िंदगी का खेल   


कैसे कैसे खेल दिखाए ये ज़िंदगी
पल में हंसाये तो पल में रुलाये ये जिंदगी,
हर आती जाती साँसों की धड़कन से
होने न होने का एहसास दिलाये ये जिंदगी।।

रंग बदलते रिश्तों का असली रंग दिखाए ये जिंदगी
अपने पराये का भेद बताए ये जिंदगी,
शर्मिंदा हो जाती है ये भी उस वक्त
जब कोख के दर्द को भी न समझा पाए ये जिंदगी।।

बिखरते रंगों का एहसास कराती है ज़िंदगी
हर गुज़रते वक्त के साथ एक नया आगाज़ कराती है,
जब अपनों से ही ज़ख्म मिलने लगे
तो इक नए जीवन का एहसास कराती है जिंदगी।।

बिछड़ना ही जब मुनासिब लगने लगे
तब फासलों के मुहावरों की समझाती है जिंदगी,
झूठ के प्रहार से जब घाव नासूर बन जाये
तो घाव पर मरहम भी लगाती है जिंदगी।।

सच कहो तो जीवन के उतार चढ़ाव जैसे भी हों
जीने की राह बताती है ये जिंदगी।।

अजय कुमार पाण्डेय



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