जी लेते हैं

       जी लेते हैं       


जब जो भी सोचा कर लेते हैं
ज़िंदगी कैसी भी हो , जी लेते हैं।

यूँ तो बेखौफ खेला करते हैं हम
पर जाने क्यों अपनी ही जीत से डरते हैं।

क्या सच्चा था क्या झूठा था
अब ध्यान नही रहता ,
जिसको भी परखा था
सब भूल गए हैं।।

अब तो चारों तरफ 
एक धुंधली सी तस्वीर नज़र आती है,
सूरत जो भी बनाई थी जहन में
सब भूल गए हैं।।

सुनता रहा सबों के शिकवे खामोशी से
जब अपनी बारी आई तो सब भूल गए हम।।

छुप के रोते हैं हम ज़माने की नज़रों से
अब तो शिकवा भी खुद से ही किया करते हैं।।

वक्त मिले तो कभी ढूंढ लेना
मेरी वफाओं को,
शायद तुम्हे ही मिल जाये
तुम्हारे जानिब किसी रस्ते में।।

अजय कुमार पाण्डेय



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