अँधियारे में दीप जला दे, पत्थर दिल में प्रीत जगा दे।
ऐसा पावन गीत लिखूँ मैं, साँसों को मनमीत बना दे।
भटक रही जो राहें सूनी, हर उन राहों को मीत मिले,
काँटों भरे डगर में सबको, नव कोंपल के नव गीत मिले।
मुरझाई कलियों की सुधि ले, मधुमास पुराना लौटा दे,
ऐसा पावन गीत लिखूँ मैं, साँसों को मनमीत बना दे।
जो टूटे हैं इस दुनिया में, उन सबको थोड़ा प्यार मिले,
संवादों की मधुर छाँव में, सब शब्दों को संसार मिले।
घृणा, द्वेष के इस मरुथल को, नेह का सागर आज बना दे,
ऐसा पावन गीत लिखूँ मैं, साँसों को मनमीत बना दे।
शब्द-शब्द में करुणा जागे, हर अन्तर्मन का तार बजे,
तेरी मेरी अमर कहानी, से इस जग का श्रृंगार सजे।
दूर करे जो सब दूरी को, ऐसा पावन प्रीत जगा दे,
ऐसा पावन गीत लिखूँ मैं, साँसों को मनमीत बना दे।
अँधियारे में दीप जला दे, पत्थर दिल में प्रीत जगा दे,
ऐसा पावन गीत लिखूँ मैं, साँसों को मनमीत बना दे।
✍️अजय कुमार पाण्डेय
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