मन के सारे सुर तार गये,
अपनों के सारे प्यार गये।
ना जीत सके इस दुनिया को,
हम आदर्शों से हार गये।
सच्चाई का रस्ता पकड़ा,
छल-कपटों ने हमको जकड़ा।
लाख जतन कर धीर धरा पर,
भाग्य हमारा हमसे अकड़ा।
सपनों के अब पतवार गये,
जीवन के सब पतझार गये।
ना जीत सके इस दुनिया को,
हम आदर्शों से हार गये।
नेकी की राहों पर चलकर,
देखा जग का रूप बदलकर।
यहाँ मुखौटे बिकते सस्ते,
मानवता रोती पल-पल मर।
सब उम्मीदों के हार गये,
सब साँसों के व्यापार गये।
ना जीत सके इस दुनिया को,
हम आदर्शों से हार गये।
छोड़ गए सब संगी-साथी,
बुझती जाती मन की बाती।
पर संतोष यही है दिल को,
आत्मा अपनी नहीं लजाती।
अब भले यहाँ संसार गये,
जो मिला उसे स्वीकार गये।
ना जीत सके इस दुनिया को,
हम आदर्शों से हार गए।
✍️अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें