धीरे-धीरे दिन ढलता है
संध्या के इस सूने पल में धीरे-धीरे दिन ढलता है|
चलता रहा अकेला पथ में सारा दिवस ताप में पिघला,
कभी घने बादल ने घेरा कभी धुंध से बाहर निकला|
देता रहा नेह उष्मा का और ताप भी प्रचुर दिया है,
संबंधों के ठंडे घर में भावों का मन प्रखर किया है|
अगणित स्वप्न सजाये दिन भर कुछ कोरों में ले ढलता है,
संध्या के इस सूने पल में धीरे-धीरे दिन ढलता है|
सदा एक सी दिनचर्या है सदा एक सा अनुशासन,
सुबह शाम तक जीवन पथ में करता सदा एक आवाहन |
जब तक दिवस चला अंबर में अवनी ने मनुहार किया है,
जैसे हुआ शिथिल संध्या में ये बासी अखबार हुआ है |
अख़बारों के बासी पन्नों से अपनी आँखें मलता है,
संध्या के इस सूने पल में धीरे-धीरे दिन ढलता है|
सदा वात अनुकूलित घर में जीवन का अनुमान खोजते,
आधी उम्र गुजर जाती है प्यालों में तूफ़ान खोजते|
जीवन के ताने -बाने में एक अधूरी रही कामना,
साथ गुजरती रही रात पर सदा रही अतृप्त वासना|
दूर क्षितिज में ढलते-ढलते सपनों से अनबन खलता है,
संध्या के इस सूने पल में धीरे-धीरे दिन ढलता है|
✍अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद
01 नवंबर, 2025
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