छलक जाती है कविता।

छलक जाती है कविता।  

उफनते भाव मन के जब ,पलक के कोर तक आते
आँखों की सियाही से, छलक जाती है तब कविता।

नदी गहरी तेज धारा, लगे धुँधला जब किनारा
राहें चल के रुक जायें, नजर कुछ दूर झुक जायें
थके मन से किनारे जब, नहीं कुछ और चल पाते
आँखों की सियाही से, छलक जाती है तब कविता।

आहें जब बिलखती हों, ये साँसें जब तड़पती हों
बीते दौर की बातें, जब पलकों से बरसती हों
थोड़ी दूर जाकर के, कदम जब खुद ही रुक जाते
आँखों की सियाही से, छलक जाती है तब कविता।

पलकों को भिंगोती है, जब नींदों में सताती है
बदलते मौसमों में जब हँसाती है रुलाती है
नजर कुछ दूर जाकर जब खयालों में उलझ जाए
आँखों की सियाही से, छलक जाती है तब कविता।

तड़कती धूप में दिल जब बिखरती छाँव को देखा
तड़पते दर्द को देखा बिलखते भाव को देखा
आँचल से अलग हो कर, जो तारा टूट गिर जाते
आँखों की सियाही से, छलक जाती है तब कविता।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        02जून, 2023

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