अर्पित करने आया हूँ।

अर्पित करने आया हूँ।  

शब्दों के गुलशन से चुनकर कोमल कलियाँ लाया हूँ
गीतों में कुछ पुष्प सजाकर अर्पित करने आया हूँ।।

नहीं पास है सोना चाँदी धन दौलत की चाह नहीं
कल क्या होगा किसने जाना मुझको भी परवाह नहीं
वर्तमान से मिला मुझे जो पूजित करने आया हूँ
गीतों में कुछ पुष्प सजाकर अर्पित करने आया हूँ।।

दुनियादारी बोध नहीं है बीते का अफसोस नहीं
अच्छे का नतमस्तक हूँ मैं बुरा किसी का दोष नहीं
जग से कितना कुछ पाया है अर्हित करने आया हूँ
गीतों में कुछ पुष्प सजाकर अर्पित करने आया हूँ।।

लिखे गीत जो मन को भाये जिसने पग-पग बहलाया
पीड़ा के आवेगों में भी जिसने मन को सहलाया
उन्हीं पँक्ति के आदर्शों को अर्चित करने आया हूँ
गीतों में कुछ पुष्प सजाकर अर्पित करने आया हूँ।।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        15मार्च, 2023

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