संग-संग जब हम गाएंगे।।

संग-संग जब हम गाएंगे।।

निज सपनों के पुण्य पंथ ये
सुरमित सुरभित हो जाएंगे
संग-संग जब हम गाएंगे।।

बाट जोहती इन पलकों को
सुख सपनों से मैं बाँधूँगा
उर में उपजे भाव सभी जो
गीतों में उनको साधुंगा
बादल की उजली किरणों से
सपने सारे सज जाएंगे।।

दिल ये अब तक रहा उपेक्षित
मन वीणा के मृदु तारों से
रहा अपरिचित जीवन अपना
वीणा के मृदु झंकारों से
गूँजेंगे सब भाव हृदय के
गीत अधर पर सज जाएंगे।।

आशाओं के पंथ सजा कर
अपने सपनों को साजेंगे
चंचल मन के भाव सुनहरे
साथ-साथ में हम साधेंगे
चंदा की किरणों से सजकर
स्वप्न लोक तक हम जाएंगे।।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        27मार्च, 2023


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