जो स्वप्न सजे ही नहीं पलक पर कैसे कह दूँ बिखर गये।।

जो स्वप्न सजे ही नहीं पलक पर कैसे कह दूँ बिखर गये।।


यादों के मानसरोवर से कुछ मुक्तक गिर कर बिखर गये
जो स्वप्न सजे ही नहीं पलक पर कैसे कह दूँ बिखर गये।।

लय का जब कुछ भान नहीं था 
गीतों में कैसे कह पाता
सरगम से जब रहा अपरिचित
गीत कहीं मैं कैसे गाता
जब भाव सजे ही नहीं पटल पर कैसे कह दूँ बिछड़ गये
जो स्वप्न सजे ही नहीं पलक पर कैसे कह दूँ बिखर गये।।

जब अपना अध्याय नहीं था 
लिखता कैसे कहो कहानी
कैसे लिखता सारी बातें
जिनसे सुधियाँ थीं अनजानी
जब रहा कथानक का अभाव फिर कैसे कह दूँ बिसर गये
जो स्वप्न सजे ही नहीं पलक पर कैसे कह दूँ बिखर गये।।

कितना चाहा के कह डालूँ
बातें मन के मौन सफर की
कितना चाहा आज जता दूँ
प्यास मैं अधरों को अधर की
पर मधु से संपर्क नही जब कैसे कह दूँ बिछड़ गये
जो स्वप्न सजे ही नहीं पलक पर कैसे कह दूँ बिखर गये।।

यहाँ वहाँ से शब्द उठा कर
कैसे लिखता मन की बातें
कैसे लिखता भाव सभी वो
कैसे लिखता बीती रातें
जब रातों का इतिहास अधूरा कैसे कह दूँ बिछड़ गये
जो स्वप्न सजे ही नहीं पलक पर कैसे कह दूँ बिखर गये।।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
       28मई, 2022

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