खुद को ठहरा पाओगे।

खुद को ठहरा पाओगे।  

जब भी मेरे गीत पढोगे
यादों में खो जाओगे
घिर जाओगे उन गलियों में
खुद को ठहरा पाओगे।।

शब्द शब्द हैं भाव निखारे
पंक्ति पंक्ति आँचल पैसारे
हमने जग की रीत लिखा है
तुमसे पाया गीत लिखा है
खो जाओगे इन गीतों में
खुद को तुम लहराओगे
घिर जाओगे उन गलियों में
खुद को ठहरा पाओगे।।

सूरज की तन्हाई लिख्खी
चंदा की रुसवाई लिख्खी
मैंने अपने इन गीतों में 
भावों की अँगड़ाई लिख्खी
शब्दों के दीवानेपन में
भावों का पहरा पाओगे
घिर जाओगे उन गलियों में
खुद को ठहरा पाओगे।।

मैंने मन की आस लिखी है
बुझी नहीं जो प्यास लिखी है
प्यासे पपिहे के अंतस की
चाहों की मधुमास लिखी है
प्यासे मन के अश्रू बहे जो
कैसे फिर बहलाओगे
घिर जाओगे उन गलियों में
खुद को ठहरा पाओगे।।

©️✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        05जुलाई, 2021



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