हम आहों में भी गाते हैं।

हम आहों में भी गाते हैं।  

कदम-कदम पर उलझन कितनी
हम जिसको सुलझाते हैं
कुछ रुसवाई कुछ तन्हाई
हम आहों में भी गाते हैं।

जीवन जीते हैं हम लेकिन
जीवन को समझा कितना
जैसी उलझन राह खड़ी थी
शायद हमने समझा उतना।

जीवन की पगडंडी पर हम
आखिर तक आते जाते हैं।
कुछ रुसवाई कुछ तन्हाई
हम आहों में भी गाते हैं।।

थोड़ी खुशियाँ हैं दामन में 
थोड़े  दुःख भी साथ चले
जीवन जीने की खातिर
हम मौसम के साथ ढले।

मौसम की कठिनाई से भी
हम छोड़ नहीं कुछ जाते हैं।
कुछ रुसवाई कुछ तन्हाई
हम आहों में भी गाते हैं।।

उलझन-सुलझन की बेदी पर
कभि संबंधों की बली चढ़ी
कभी कहीं कुछ पाया हमने
और कभी कुछ छोड़ चली।

इस छोटे से जीवन में हम
क्या कुछ खोते पाते हैं।
कुछ रुसवाई कुछ तन्हाई
हम आहों में भी गाते हैं।।

✍️©️अजय कुमार पाण्डेय
       हैदराबाद
       04जनवरी, 2021


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