मैंने दर्द जिया

         मैंने दर्द जिया         


अलिखित पीड़ा सहन किया
मैंने तो हर पल दर्द जिया
हर आती जाती सांसों ने
प्रतिपल यूँ स्तब्ध किया
मैंने तो पल पल दर्द जिया।।

यादों का सागर विशाल
स्मृतियों ने ही छल किया
हर आती जाती लहरों ने
नख से शिख तक तरल किया।
मैंने तो प्रतिपल दर्द जिया।।

इक मुट्ठी आकाश की चाहत में
स्वअस्तित्व को अविच्छिन्न किया
न  मीरा थी, न थे कान्हा
फिर भी पल पल गरल पिया।
मैंने तो प्रतिपल दर्द जिया।।

मूक परिस्थितियों के अधीन
अंतर्मन से निःशब्द चीत्कार किया
पर अविरल कशमकश चक्रवात में
मैंने ढलना सीख लिया।
हाँ मैंने दर्द में जीना सीख लिया।।

अजय कुमार पाण्डेय


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