अस्सी - लहरों का विरह-राग
गंगा की लहर-तरंगों में इक आभास बहा जाता है,
सिक्त रेत पर मौन प्रतीक्षा का इतिहास लिखा जाता है।
गंगा की यह चंचल धारा, छूकर तट को मुड़ जाती है,
पर अंतस की व्याकुलता में, ये मिलने को अकुलाती है।
वीचि-वीचि में कंपित-शिल्पित, सुंदर सा मुखड़ा दिखता है,
जल की हर चंचल लहरों पर, विरह-काव्य कोई लिखता है।
शीतल मंद सुवासित मारुत, सुलग रही अंगारे जैसी,
घाटों की यह मरण-शरण भी, आज हुई चौबारे जैसी।
दीप तैरते जो लहरों पर, वे हर साँसों की राहत हैं,
सुलग रहे कुछ डूब रहे हैं, अरु कुछ यादों की चाहत हैं।
मज्जन करती दुनिया सारी, अपना अंतस धोने आती,
पर विरह-अग्नि की यह ज्वाला, कब गंगा-जल से बुझ पाती।
आरती की घंटियों में भी, गूँज रही है तान रुहानी,
अस्सी के एकांत क्षितिज पर, मौज लिख रही नई कहानी।
तुम पावन गंगा की धारा, मैं एक किनारे का पत्थर,
तुम लहरों का मधुर गीत हो, मैं हूँ सदियों का अंतर।
लहरों की यह मदिर चपलता, बस एक बहाना लगती है,
रात विरह की अस्सी तट पर, मुसकाती सिसकी लगती है।
लौटोगे किस मोड़ प्रिये तुम, यही पूछने लहरें आती,
लेकिन तटबंधों को छूकर, चुपचाप स्वयं ही बह जाती।
अस्सी की इन मौन लहर में, इक आभास बहा जाता है,
सिक्त रेत पर मौन प्रतीक्षा का इतिहास लिखा जाता है।
✍️अजय कुमार पाण्डेय
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