प्रण की जीत
अपने प्रण की जीत लिखोगे दुश्मन की कब हार लिखोगे।
बहुत सह चुके तानाशाही बहुत सह चुके आरोपों को,
बहुत सहे हैं घाव पीठ पे बहुत सह चुके धोखों को।
कब अपने गीतों में अपने मन की बात उठाओगे,
जिन शब्दों से दर्द मिला है बोलो कब वो गाओगे।
बहुत सह चुके घाव पीठ पे बोलो कब प्रतिकार लिखोगे।
जब तक इक ऊँगली की धुन पर अपनी तकदीर सँवारोगे,
तब तक जीवन के इस कुरुक्षेत्र में सारी बाजी हारोगे।
संस्कारों के कुरुभूमि में तुम जब तक यूँ ही सोओगे,
चीर हरेगी मौन सदन ये सुख चैन हृदय का खोओगे।
भीष्म बने जो मौन सदन में केवल अपनी हार लिखोगे।
जाने कितना जहर घुला है देखो तो यहाँ फिजाओं में,
घुटी-घुटी सी चीख दबी है साँसों में मौन हवाओं में।
दरबारी हो गयी व्यवस्था फिर सच को कौन सँभालेगा,
दरबार सजेंगे चौसर से फिर सच का वस्त्र उतारेगा।
चक्र सुदर्शन छूटेगा जब शिशुपाल से हार लिखोगे।
✍️अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद
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