दो नयन अबोले
पलक झुकाते पलक उठाते नयनों के चौखट पर आते,
साँसों के निज मौन समर्पण के मन भावों को समझाते।
जटिल भाव को सहज बनाकर बूझे मन के भाव अबूझे,
मन हो जिसका भोर पुष्प सा उसको माने उसको पूजे।
पलकों से अनुरंजन करते इक पल मूँदे इक पल खोले।
भावों के ले उड़नखटोले परबत पार उतर जाते हैं,
सागर की गहराई में भी जाते और निखर जाते हैं।
सागर की गहराई या फिर परबत कब इसका पथ रोके,
पलकों की छाँवों में आया हुआ यहाँ वो इसका होके।
इक पल में सदियाँ दे जाते शरमा कर घूँघट जब खोले।
दो नयनों के गहन भाव ने गीतों का हर बंध सजाया,
पंक्ति-पंक्ति को मधुर तान दी मगन हुआ मन जिसको गाया।
यादें जब चौखट पर आयीं हँसकर उनके चरण पखारे,
जिसका मन हो नेहा भरा हो उनपर अपना सबकुछ वारे।
अंतस के सब भाव पिरोकर बोल गए दो नयन अबोले,
यादों के अवगुंठन खोले बोले जब दो नयन अबोले।
✍️©️अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद
24जनवरी, 2026
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