कल का नव गीत

कल का नव गीत 

कल का गीत नया होगा फिर क्यूँ कल का गीत सुनाऊँ 
आज सुनाता हूँ जिसको क्यूँ फिर कल वो गीत सुनाऊँ 

नया-नया उपवन होगा नई-नई कोंपल फूटेगी 
नये-नये फिर पुष्प खिलेंगे नई रागिनी गूंजेगी 
नया-नया आकाश सजेगा नई रश्मियाँ आएँगी 
घासों के कोमल छौने पर नई आस मुस्कायेगी 

कल का शब्द नया होगा फिर क्यूँ कल का शब्द सजाऊँ 

जो बीता इतिहास बन गया पन्नों में सो जाने दो 
नई धड़कनों के गीतों को आज चलो अपनाने दो 
नये अर्थ के भींगे पल में नये-नये शब्द गढ़ेंगे 
कल की सूखी शाखों पर गीतों के नव पुष्प सजेंगे 

नये शाख का गीत नया क्यूँ फिर बोझिल याद झुलाऊँ

नया प्रश्न है नया उजाला और आज की रीत नई 
बीते कल की परछाईं से मौन निकलती प्रीत नई
कल के बीते लम्हों को फिर गीत बनाकर क्यूँ गाऊँ
टूटे सपनों की राख उठा फिर से क्यूँ दीप जलाऊँ

इस पल का जब गीत नया सदियों का क्यूँ गीत सुनाऊँ 

कल का गीत नया होगा फिर क्यूँ कल का गीत सुनाऊँ 
आज सुनाता हूँ जिसको क्यूँ फिर कल वो गीत सुनाऊँ 

✍️©️अजय कुमार पाण्डेय 
          हैदराबाद 
         26 जनवरी, 2026

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