फिर गीतों में आस जगा दो

फिर गीतों में आस जगा दो

तुम गीत नगर की रानी हो मैं गीत नगर का बंजारा,
छंद-छंद में रमने वाली मैं पंक्ति-पंक्ति का बंजारा।
स्वर की गलियों में मेरे भी गीतों में अहसास जगा दो,
फिर गीतों में आस जगा दो।

लिये पथिक गीतों की गठरी नगर-नगर में घूम रहा है,
अधरों पर छंदों का प्याला बूँद-बूँद पी झूम रहा है।
शब्दों की चौपाल सजा कर इनको अपने पास बिठा लो,
फिर गीतों में आस जगा दो।

टूट रही है डोर आस की अँधियारे में छिटक रही है,
सांध्य ढले गोधूली में वो बिना सहारे भटक रही है।
अँधियारे में दीप जलाकर होने का अहसास दिला दो।
फिर गीतों में आस जगा दो।

बीत न जाये मधुर यामिनी इन आहों के अँधियारे में,
भटक न जायें भाव हृदय के सूने-सूने गलियारे में।
मन के सूने गलियारे में इक बार पुनः मधुमास जगा दो,
फिर गीतों में आस जगा दो।

✍️©️अजय कुमार पाण्डेय 
          हैदराबाद 
          22 जनवरी, 2026



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