क्या पता फिर शब्द इनके धूल बनकर खो न जायें।
आइना है वो कहाँ जिसने हमारा रूप साजा,
रौशनी को ढूँढ़ने में रात से क्या-क्या न माँगा।
रौशनी की आस में ही शब्द ये मुरझा न जायें,
आइने को ढूँढ़ने में गीत ही बिसरा न जायें।
आ बना लें आइना हम नैन की इन पाँखुरी को,
क्या पता के दूरियों से आइना ही खो न जाये।
याद की हल्की छुअन अब भी हवाओं में घुली है,
मौन अधरों की छुअन भी पंक्तियों में ही कहीं है।
फूल पर कब तक रहेंगे दाग ये मजबूरियों के,
और कब तक ढो रहें हम बोझ अपनी दूरियों के।
आ मिटा दे दूरियों को भूल कर मजबूरियों को,
क्या पता मजबूरियों में चाहतें झुलसा न जायें।
है कहीं अब भी हृदय में चाहतों की लौ कहीं पर,
आ जलायें दीप फिर से याद के हम तुम वहीं पर।
फिर दो कदम हम भी चलें फिर दो कदम तुम भी चलो,
जो छोड़ आये राह में उस मोड़ पर फिर से मिलो।
फिर आ जलायें दीपिका हम श्वास की प्रश्वास की,
क्या पता अविश्वास की लौ हमें झुलसा न जाये।
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