मन की वेदनायें

मन की वेदनायें 

क्या कहें किसको यहाँ दिल की सुनायें 
मन ये अपना दर्द अपनी वेदनाएं 

क्या लिखा है ग्रंथ में सब भूल बैठे 
अब याद केवल रह गयी वर्जनायें 

बैठ कर आकाश में वो इस जगत के 
बस ढूंढते हैं स्वार्थ की संभावनायें 

क्या मिलेगा बेचकर धरती गगन 
टूटेगी केवल हृदय की आस्थाएं 

स्वार्थ सिद्दी में यहाँ अंधे हुए जो 
क्या पढ़ेंगे वो किसी की भावनायें 

चाहते हैं भोर को सब रात कह दें 
फिर क्या कहेंगी भोर की प्रार्थनायें 

बोलने पर हो गया प्रतिबंध यदि तो 
कैसे सुनेंगे लोग कवि की भावनायें

मोल स्याही का यहाँ फिर क्या रहेगा 
जब पृष्ठ पर केवल लिखेंगी यातनायें 

है ग़ुमान जिनको के डूबेंगे नहीं वो 
सांध्य में देखें वो पश्चिम की दिशायें

✍️©️अजय कुमार पाण्डेय 
          हैदराबाद 
          18 जनवरी, 2026

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