कहानी-दुखनी की
दुखनी के जब भाग जगेंगे उस दिन अलग कहानी होगी।
कभी चमक कर बनी रौद्र ये और कभी आँखों का पानी,
कहीं किया मजबूर किसी को और कहीं बनी राजधानी।
सदा भुनाया राजनीति ने हर लोकलुभावन नारों में,
गठबंधन में सदा रही हर आती जाती सरकारों में।
दुखनी कब तक रहे पृष्ठ में कब तक ये मनमानी होगी,
दुखनी के जब भाग जगेंगे उस दिन अलग कहानी होगी।
भवसागर में फँसी नाँव जब तब ये तारणहार बनी है,
राजनीति की डगमग कश्ती की ये खेवनहार बनी है।
कितने झंझाओं से गुजरी लेकिन कीमत घटी नहीं है,
युग बदले दुनिया बदली पर मंचों पर ये डटी रही है।
दुखनी कब तक राजनीति में हर मुद्दों की रानी होगी,
दुखनी के जब भाग जगेंगे उस दिन अलग कहानी होगी।
ऊँगली की स्याही ने इसको चाहा जैसा वैसा तोला,
कभी सदन को खूब छकाया अपना मुख जब इसने खोला।
सस्ती हरदम रही सभी को हर डूबे का बनी सहारा,
जब राजनीति की डूबी नैया इसने है पार उतारा।
दुखनी के संग-संग कब तक राजनीति मनमानी होगी,
दुखनी के जब भाग जगेंगे उस दिन अलग कहानी होगी।
राजनीति की भेंट चढ़ी है दुखनी की सारी अभिलाषा,
जात धर्म के पेंच फँसी है इसकी हर इच्छा हर आशा।
एक झूठ ने मारा इसको दूजे ने इसको पुचकारा,
अपने-अपने स्वार्थ सिद्ध में इसको बना दिया बस नारा।
राजनीति के गलियारे में कबतक यूँ मनमानी होगी,
दुखनी के जब भाग जगेंगे उस दिन अलग कहानी होगी।
✍️©️अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद
17 जनवरी, 2026
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें