गुणगान किया

गुणगान किया 

अपने मन के सूनेपन में हमने बस ये काम किया, 
कभी मौन को गले लगाया कभी तुम्हारा नाम लिया। 

तन्हाई जब कभी भींग कर नैनों में भर आती है,
अंतस के सोये भावों को थपकी वो दे जाती है।
मन के सोये नील गगन में इक आहट सी होती है,
अध सिंचित मन की क्यारी में मोती मनके बोती है।

अध सिंचित मन की क्यारी ने बूँदों को इक नाम दिया।

गली-गली बदनाम हुआ हूँ मन ही मन मुस्काने से,
खुद से भी हो गया अजनबी तुमसे नेह लगाने से।
मन के ताम्रपत्र पर केवल गीत तुम्हारे नाम लिखा,
जीवन के हर कदमताल की जीत तुम्हारे नाम लिखा।

हार-जीत से ऊपर उठकर हर पल नव आह्वान किया।

है इतनी अरदास गीत की छंदों में ही घुल जाओ,
कब तक गीत अबोले होंगे इनसे आकर मिल जाओ।
शब्द-शब्द अह्लादित हों अधरों का आलोड़न दे दो,
अब तक हैं गुमनाम गीत इनको इक सम्बोधन दे दो।

ये गीत अगीत रह न जाएँ अधरों ने गुणगान किया।

©️✍️अजय कुमार पाण्डेय    
          हैदराबाद 
          11 जनवरी, 2026

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