साँसों को बहला लेना

साँसों को बहला लेना 

ये पाँव कहीं ज़ब रुक जाएँ,
जब शब्द अधर के चुक जाएँ,
जब स्वप्न अधूरे लगे कभी 
कुछ शब्द हृदय में चुभे कभी 
जब कोई अपने साथ न हो 
जब तिनके का भी हाथ न हो 
जब भीतर की लौ मद्धम हो 
प्रतिकूल भले जब मौसम हो 
तब खुद से नेह लगा लेना 
इन साँसों को बहला लेना।

जब धुंध कभी गहरा जाये
अंदेशों से घबरा जाये 
जब रस्ते सारे बंद लगें
जब मन की गलियाँ तंग लगे 
जब प्रश्नों का अंबार लगे 
हर उत्तर जब अंगार लगे 
रिश्तों का जब मोल न हो 
कर्तव्यों का कुछ मोल न हो 
तब खुद को ही समझा लेना 
इन सांसों को बहला लेना।

जब हर कोशिश बेमानी हो 
जब अपनों में गुमनामी हो 
जब रिश्तों में ऐयारी हो 
अपनों में मारा मारी हो 
जब धन से तोला जाता हो 
भावों से खेला जाता हो 
जब आँसू का सम्मान न हो 
जब शब्दों का कुछ मान न हो 
तब आँसू को फुसला लेना
इन साँसों को बहला लेना।

जब अंतर्मन में जंग लगे 
हर उत्तर मन को तंग लगे 
तब मौन उजाला साधो तुम 
इक धागा मन का बाँधो तुम 
पलकें हर भार नहीं ढोती 
हर चुप्पी हार नहीं होती 
जब बूँदेँ मन सहलाती हैं
नई कहानी लिख जाती हैं 
इक दीपक नया जला लेना 
इन साँसों को बहला लेना 

✍️अजय कुमार पाण्डेय 
     हैदराबाद 
     05 जनवरी, 2026

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