जीवन
सुबह नई उम्मीदें देती हर शाम थकन दे जाती है,
मौन हँसी के पीछे छुपकर इक चुप सी सिसकी आती है।
जो देखा जग ने सत्य नहीं था सत्य रहा वो दिखा नहीं,
भीड़ बहुत थे रस्ते में पर संग-संग कोई चला नहीं।
और नहीं पहचान यहाँ कुछ है और नहीं अरमान यहाँ,
जीवन के थोड़े से सपने बस हो थोड़ी पहचान यहाँ।
मौन रहे जो यहाँ जगत में शब्द पराये हो जाते हैं,
ज्यादा जिनसे आस रहेगी वही पराये हो जाते हैं।
जीवन के इस महापरिधि में सबकी अपनी सीमायें हैं,
सब अपने-अपने हिस्से का आराध्य यहाँ ले आये हैं।
शब्द-शब्द की क़ीमत जब टूटे भीतर का अभिमान यहाँ,
रिश्तों के देवालय में तब होता रिश्तों का मान यहाँ।
वक्त सिखाता हर इंसाँ को हो चाहे देर सवेर सही,
जो कल तक थे साथ हमारे आज यहाँ बस एक सही।
जो पाया उसमें खुश रहकर जो छूटा उसको जाने दे,
हर हार नहीं है बोझ यहाँ कुछ को अनुभव बन जाने दे।
उद्द्यम का कुछ मोल नहीं है थके नहीं यदि प्राण यहाँ,
और सफलता की क्या कीमत यदि मिटे नहीं अभिमान यहाँ।
✍️अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद
01जनवरी, 2026
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