वीर शहीदी दिवस

वीर शहीदी दिवस 

नस नस में जिसके राष्ट्रवाद हो खून भरा हो भक्ति का 
उनका शांत भाव ही देगा उत्तर अरि की कुत्सित शक्ति का 
चाहे कितना हो तूफ़ान भयंकर बिखर नहीं वो सकते हैं 
अरि के कुत्सित चालों में भी प्रण उनके बिखर नहीं सकते हैं 
स्वाभिमान के धनी थे दोनों राष्ट्रवाद के वाहक थे 
देश प्रेम की सच्ची ज्वाला के दोनों संवाहक थे 
तन दोनों के नाजुक थे पर मन दोनों के प्रस्तर थे 
त्याग तपस्या राष्ट्र धर्म की खातिर दोनों कट्टर थे 
गुरु गोविन्द सिंह ने दोनों के मन में ऐसी ज्वाला फूंकी थी 
लोभ मोह दुनिया के वैभव सब उनके सम्मुख झूठी थी 
अरि के सम्मुख खड़े थे तन कर मन में कोई लोभ न था 
सर पर मृत्यु नाच रही थी पर मन में कोई क्षोभ न था 
चुनवा दो हमको दीवारों में या हमको हाथी से मरवा दो 
रखो ईंट पर ईंट यहाँ पर हमको गारे में डलवा दो 
नहीं झुके हैं नहीं झुकेंगे अपनी हर साँसें बोलेंगी 
मृत्यू के पश्चात भी दोनों की लाशें ये ही बोलेंगी 
धर्म हमारा मूल मंत्र है त्याग समर्पण जीवन है 
जिसका कुछ उद्देश्य नहीं है व्यर्थ यहाँ वो जीवन है 
जोरावर और फतेह सिंह का राष्ट्र सदा ही कृतज्ञ रहेगा 
वीर शहीदी की गाथा से भारत का जन-जन भिज्ञ रहेगा 
व्यर्थ नहीं बलिदान तुम्हारा युग-युग तक सदियाँ गायेगी 
राष्ट्र प्रेम और धर्म भक्ति की शिक्षा तुमसे ही  पाएगी 

✍अजय कुमार पाण्डेय 

गीत

गीत 

कुछ अनजाने बूँद छलक कर नयनों के द्वारे जब आये 
तप्त हृदय को शीतल कर के वही बूँद फिर गीत कहाये 

कुछ पुष्प हृदय में खिले कभी जब देख चितेरे मँडराये 
नेह कलश के घट पर हमने बूँद-बूँद मधु के छलकाये 
ढूँढ़-ढूँढ़ कर पथ को साजा मधु छलकाये द्वारे-द्वारे 
पंक्ति-पंक्ति में नेह सजाकर आया फिर मन द्वार तिहारे 

बुझी प्यास तब निज नयनों की नयनों ने जब रस छलकाये 
तप्त हृदय को शीतल कर के वही बूँद फिर गीत कहाये 

मौन तपाया खुद को जबसे मन अपने आप जवानी में 
अनजाना सा मोड़ दिखा है इस मन को आज कहानी में 
खुद ही मन से नेह जताया है खुद ही मन को समझाया 
अपने मन के साथ लिपट कर अपने ही मन को बहलाया 

किसे दोष दे सूनेपन का मन गाये तो कैसे गाये 
तप्त हृदय को शीतल कर के वही बूँद फिर गीत कहाये 

अच्छा होता दुनियादारी से मन ये अनजाना रहता 
अपना क्या है कौन पराया सब जाना अनजाना सहता 
बुझी प्यास कब जाने कितने प्यालों से प्याले टकराये 
आते जाते सूने पथ में कितने पैमाने छलकाये 

अच्छा होता नहीं मचलते गीत हृदय में जो मुरझाये 
तप्त हृदय को शीतल कर के वही बूँद फिर गीत कहाये 

मन को अपने बहुत सँभाला है हमने दुनियादारी में 
पलकों को अपने पुचकारा हर सपनों की तैयारी में 
लेकिन बदले हालातों को जब देखा मन को क्षोभ हुआ 
पग-पग कितनी ठोकर खायी तब जाकर मन को बोध हुआ 

रहे अधूरे गीत हृदय के नयनों ने फिर उनको गाये 
तप्त हृदय को शीतल कर के वही बूँद फिर गीत कहाये 

✍© अजय कुमार पाण्डेय 
          हैदराबाद 
          20 दिसंबर , 2025






अंजुरी भर किरण थी मन में तुमने तो आकाश सजाया

अंजुरी भर किरण थी मन में 
तुमने तो आकाश सजाया 

सपन सलोने सुभग सुहाने नित पलकों पर स्पंदन करते 
नयन कोर के आलोड़न से अंतर्मन अनुरंजन करते 
सूने मन के अँधियारे में मचल चाहतें जली दीप सी 
सुख की मोती लिये चाहतें लगीं चमकने सुभग सीप सी 

नयन कोर में कुछ सपने थे 
तुमने तो संसार सजाया 
अंजुरी भर किरण थी मन में 
तुमने तो आकाश सजाया 

शब्द-शब्द लय हुई सुसज्जित हुई सुगंधित साँस-साँस सब 
छंद-छंद आनंदित करते अर्पित मन की आस-आस सब 
छूकर मन को किया सुवासित अंग-अंग बन पारस चमका 
पुष्प बने सब शूल चुभे जो उड़ा गगन फिर सारस मन का 

दिवस-रात के मधुर क्षणों में 
तुमने द्वाराचार सजाया 
अंजुरी भर किरण थी मन में 
तुमने तो आकाश सजाया 

और नहीं कुछ आशा मन की और नहीं कुछ चाह हृदय की 
बस इतना अनुरोध हृदय का अभिलाषा है पूर्ण विलय की 
निज नयनों के सभी कोर में बनकर मूरत सजी प्यार सी  
जैसे मन की सूखी सरिता लगे मचलने गंगधार सी 

पावस ऋतु की आस हृदय की 
तुमने तो मधुमास सजाया 
अंजुरी भर किरण थी मन में 
तुमने तो आकाश सजाया 

अजय कुमार पाण्डेय 
     हैदराबाद 
     10 दिसंबर,  2025

ख़याल करता हूँ

ख़याल करता हूँ वतन को बाँटने वालों से सवाल करता हूँ, मैं आज भी उसी भारत का ख़याल करता हूँ। जो सच की बात करे उसकी आवाज़ दबती है, मैं ऐसे हर सि...