साँसों का सुमधुर गान

साँसों का सुमधुर गान 

पलकों की चौखट पर सपने तब तक हैं अनजान प्रिये,
अधरों पर जब तक ना आये स्नेहिल मृदु मुस्कान प्रिये।

सारे गान अधूरे तब तक अधरों पर जब तक ना आये,
साँसों की मुस्कान अधूरी जब तक अंतर्मन ना गाये।
अंतस के भावों से जीवन ये तब तक है अनजान प्रिये,
अंतस में जब तक ना आये स्मृतियों का मृदु गान प्रिये।

दृग गागर से बूँद छलक कर जब तक मन को ना मदमाये,
खुशियों का सागर नयनों से निज कमल कपोलों पर छाये।
नयन बूँद के नम भावों से पलकें तब तक अनजान प्रिये,
नयनों की बूँदों को जब तक ना मिल जाये पहचान प्रिये।

जब तक प्रीत अधर ना छू ले तब तक मन मधुमास न होता,
व्याकुल रहता हिय का कोना यादों में आकाश पिरोता।
अहसासों के पुण्य भाव से मन तब तक है अनजान प्रिये,
हिय में जब तक गुंजित ना हो साँसों का सुमधुर गान प्रिये।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        16 मई, 2025

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