अय्यारी, अंदाजा

अय्यारी

अपने मन को बहुत सँभाला हमने दुनियादारी में।
पलकों को अपने पुचकारा सपनों की तैयारी में।
लेकिन बदले हालातों का तब जाकर मन को बोध हुआ,
पग-पग पर जब ठोकर खायी अपनों की अय्यारी में।

दिल में मिरे क्या था कभी हम बता नहीं पाये।
पलकों से भी कभी भाव हम जता नहीं पाये।
जो कहते हैं हमने कभी समझा नहीं उनको,
अंदाजा मेरे दिल का खुद लगा नहीं पाये।


©✍️अजय कुमार पाण्डेय
       हैदराबाद

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