गीत हो छंद हो या गजल हो कोई, मिले जब समय गुनगुना लीजिए।।



मन के भाव।

गीत हो छंद हो या गजल हो कोई, मिले जब समय गुनगुना लीजिए
भाव को रोकना जब मुनासिब न हो, भाव मन के अपने बता दीजिए
न रुका है समय न रुकेगा कभी, मन में जो कुछ दबी हो जता दीजिए।।

कहने को बात कितनी है कैसे कहें , कुछ तो सलीका बता दीजिए
आये मन पास कैसे सजन आपके , मुझे अपने दिल का पता दीजिए
हर खता आपकी है स्वीकार अब , नई फिर से कोई खता कीजिए।।

प्रतीक्षा के पल और कब तक रहें , नजर से नजर को छुआ कीजिए
रहें और कब तक अकेले यूँ ही, ले के करवट मुझे अब बता दीजिए
दीदार-ए-दिल जब खता कुछ नहीं , तो दिल को बता कर दुआ कीजिये।।

गीत हो छंद हो या गजल हो कोई, मिले जब समय गुनगुना लीजिए।।

 ©✍️अजय कुमार पाण्डेय 
        हैदराबाद 
        22मार्च, 2023


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