तुम ना आये।

तुम ना आये।  

नयन द्वार को तकते-तकते
देहरी के तोरण मुरझाये
पुष्प प्रतीक्षारत भावों के
साँझ ढले सारे कुम्हलाये
चली क्षितिज की ओर साँझ अब
रात हुई पर तुम ना आये।।

दूर सितारे कहीं गगन से
चंदा का पथ खोज रहे हैं
रात अकेली चले सफर में
कब तक मन में सोच रहे हैं
नील गगन में उड़ते-उड़ते
बादल रस्ता भूल न जाये
चली क्षितिज की ओर साँझ अब
रात हुई पर तुम ना आये।।

रात दीप की बाती जलकर
कैसे-कैसे भाव जगाए
गूंगे दिन काली रातों के
जाने कितने प्रश्न उठाये
कितने प्रश्न गिरे पलकों से
सूख गए कुछ कह ना पाए
चली क्षितिज की ओर साँझ अब
रात हुई पर तुम ना आये।।

भटक रही हैं यादें मन की
डर है रस्ता भूल न जायें
भूल गए सब रिश्ते-नाते
हाथों से पल छूट न जायें
बीती यादों के सपनों में
पल-पल मन ये उलझा जाये
चली क्षितिज की ओर साँझ अब
रात हुई पर तुम ना आये।।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        03दिसंबर, 2022

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