बाल श्रम।

बाल श्रम।   

काँधों पर प्रतिपल बोझ लिए
जीवन को आकार दिया
नन्हें नन्हें सपनो को भी
मैंने कब इनकार किया।
माना कुछ मजबूरी अपनी
फिर भी हँसता रहता हूँ
देख भाल कर जग के रौनक
मन ही मन खुश रहता हूँ।
चाहत है कुछ नया करूँ मैं
आशा के नव स्वप्न बुनूँ
पढूँ, लिखूँ नव राह चुनूँ मैं
जीवन का आधार बुनूँ।
पर मंजिल पाने की खातिर
पग पग चलना पड़ता है
इस दुनिया में जीना है तो
पग पग मरना पड़ता है।।

©️✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        10नवंबर, 2021

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