आशाओं के पुष्प।

आशाओं के पुष्प।  

आशाओं के पुष्प खिला कर
पग पग डग डग बढ़ता छल
कितने पाए कितने बाकी
नए शिखर तू चढ़ता चल।।

नहीं फिकर कर जीवन पथ की
कितने आये बीत गए
माना कुछ में हार मिली है
लेकिन कितने जीत गए।
हारे का अफसोस न कर तू
रीत नई तू गढ़ता चल
आशाओं के पुष्प खिला कर
पग पग डग डग बढ़ता चल।।

तू इस पथ का लेश मात्र है
खुद पर तू अभिमान न कर
कभी झुका जो जीवन पथ में
उसका तू अपमान न कर।
मान अभिमान से ऊपर कर
प्रतिमान नए गढ़ता चल
आशाओं के पुष्प खिला कर
पग पग डग डग बढ़ता चल।।

हार जीत अरु लोभ मोह सब
मिथ्या है आभासी है
जीवन पथ में वही खिला जो
अंतस से सन्यासी है।
किंतु परंतु से ऊपर उठ कर
नए पंथ तू गढ़ता चल
आशाओं के पुष्प खिला कर
पग पग डग डग बढ़ता चल।।

©️✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        30जुलाई, 2021


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