अनकहे गीत मेरे।

अनकहे गीत मेरे।   

अनकहे कुछ गीत मेरे
पँक्तियों में रह गए
होंठ ये चुपचाप थे अरु
आँसुओं में बह गए।।

था हृदय में शोर कितना
क्या तुम्हें बतलाऊँ
पाया जो भी दर्द हमने
क्या तुम्हें दिखलाऊँ।
घाव से आँसू मिले जो
मौन सारे बह गए
अनकहे कुछ गीत मेरे
पँक्तियों में रह गए।।

चाँद भी शरमा गया जब
देखी व्यथा रात की
सितारे भी तब रो दिए
सुनकर कथा रात की।
रात की सारी व्यथाएँ
भोर में ही छुप गए
अनकहे कुछ गीत मेरे
पँक्तियों में रह गए।।

भोर की वो लालिमा भी
खोजते हैं राज को
गीत वो जो मौन हैं अब
ढूँढ़ते हैं साज को।
साज ने जो भी सजाए
शोर में सब बह गए
अनकहे कुछ गीत मेरे
पँक्तियों में रह गए।।

©️✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        26जून, 2022

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

ख़याल करता हूँ

ख़याल करता हूँ वतन को बाँटने वालों से सवाल करता हूँ, मैं आज भी उसी भारत का ख़याल करता हूँ। जो सच की बात करे उसकी आवाज़ दबती है, मैं ऐसे हर सि...