तरसते मौसम।

तरसते मौसम।   

जगत के ताप पलकों से निकल दिल में उतरते हैं
कभी मोती कभी आँसू कपोलों पर बिखरते हैं।।

करे कभी देह को शीतल अरु मन को कभी कोमल
जाने ये भाव कैसे हैं जो पल पल मचलते हैं।।

कभी तो धूप अच्छी है औ कभी छाँव है अच्छी
पलकों के झपकते ही देखो मौसम बदलते हैं।।

जाने है चितेरा कौन जो यहाँ रंग भरता है
चली है तूलिका जितनी उतना और निखरते हैं।।

सफर को जंग ना समझो देव इतना जरूरी है
जहाँ बादल नहीं होते वहाँ मौसम तरसते हैं।।

©️✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        27जून, 2021

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