कैसे आऊँ मैं तुम तक।

कैसे आऊँ मैं तुम तक।  

पलकों पर मेरे भार बहुत है कैसे सपन सजाऊँ मैं
मेरे प्रियवर कुछ तुम ही बोलो कैसे तुम तक आऊँ मैं।।

बहुत भीड़ है दरवाजों पर
कितने आस लगाए बैठे
तुझसे मिलने की खातिर ही
खुद को हैं उलझाए बैठे
कदम कदम दरबान बहुत हैं बोलो कैसे समझाऊँ मैं
मेरे प्रियवर कुछ तुम ही बोलो कैसे तुम तक आऊँ मैं।।

कल्पना मात्र से ही तेरे
हर मन पुलकित हो जाता है
साथ मिला है जब जब तेरा
मन भावन हो खिल जाता है
तेरे वैभव के अहसासों को बोलो कैसे पाऊँ मैं
मेरे प्रियवर कुछ तुम ही बोलो कैसे तुम तक आऊँ मैं।।

कितने मौसम बीत गए हैं
तेरी आस सजाए मुझको
कितनी रातें बीत गयी हैं
तेरा दीप जलाए मुझको
कैसे तेरी कृपा मिलेगी अरु कैसे तुझको गाऊँ मैं
मेरे प्रियवर कुछ तुम ही बोलो कैसे तुम तक आऊँ मैं।।

©️✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        19जून, 2021


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