चलो जहाँ अपने मिलते हैं।

चलो जहाँ अपने मिलते हैं।

तारों को सह देख चाँदनी
हौले से मुस्काई बोली
दूर गगन की छाँव चले हम
जहाँ सभी सपने पलते हैं
चलो जहाँ अपने मिलते है।।

एकाकी जीवन ने अब तक
क्या पाया है जो खोएगा
मिले जहाँ सपनों को मंजिल
उसी गोद में चल पलते हैं
चलो जहाँ अपने मिलते हैं।।

कितनी दूर प्रभाकर का रथ
फिर भी वो ऊष्मा देता है
उसके चलने से ही सारे
ऋतुओं के मरम बदलते हैं
चलो जहाँ अपने मिलते हैं।।

ऊँच नीच का भेद न होये
मिलें सभी कोई ना खोये
सबका जीवन सहज बने जँह
जहाँ पुष्प सुंदर खिलते हैं
चलो जहाँ अपने मिलते हैं।।

©️✍️अजय कुमार पाण्डेय
       हैदराबाद
       18जून, 2021



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

ख़याल करता हूँ

ख़याल करता हूँ वतन को बाँटने वालों से सवाल करता हूँ, मैं आज भी उसी भारत का ख़याल करता हूँ। जो सच की बात करे उसकी आवाज़ दबती है, मैं ऐसे हर सि...